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वन पर्व
अध्याय १३५
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इन्द्र उवाच
अमार्ग एष विप्रर्षे येन त्वं यातुमिच्छसि |  २२   क
किं विघातेन ते विप्र गच्छाधीहि गुरोर्मुखात् ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति