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वन पर्व
अध्याय १३५
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यवक्रीरु उवाच
समिद्धेऽग्नावुपकृत्याङ्गमङ्गं; होष्यामि वा मघवंस्तन्निवोध |  २८   क
यद्येतदेवं न करोषि कामं; ममेप्सितं देवराजेह सर्वम् ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति