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भीष्म पर्व
अध्याय १०२
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सञ्जय़ उवाच
हतविद्रुतसैन्यास्तु निरुत्साहा विचेतसः |  ७४   क
निरीक्षितुं न शेकुस्ते भीष्ममप्रतिमं रणे |  ७४   ख
मध्यं गतमिवादित्यं प्रतपन्तं स्वतेजसा ||  ७४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति