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वन पर्व
अध्याय १३५
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इन्द्र उवाच
वन्धिष्ये सेतुना गङ्गां सुखः पन्था भविष्यति |  ३६   क
क्लिश्यते हि जनस्तात तरमाणः पुनः पुनः ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति