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वन पर्व
अध्याय १३५
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इन्द्र उवाच
यथैव भवता चेदं तपो वेदार्थमुद्यतम् |  ३८   क
अशक्यं तद्वदस्माभिरय़ं भारः समुद्यतः ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति