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वन पर्व
अध्याय २६
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मार्कण्डेय़ उवाच
सत्येन धर्मेण यथार्हवृत्त्या; ह्रिय़ा तथा सर्वभूतान्यतीत्य |  १६   क
यशश्च तेजश्च तवापि दीप्तं; विभावसोर्भास्करस्येव पार्थ ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति