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वन पर्व
अध्याय १३५
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यवक्रीरु उवाच
क्रिय़तां यद्भवेच्छक्यं मय़ा सुरगणेश्वर |  ४०   क
वरांश्च मे प्रय़च्छान्यान्यैरन्यान्भवितास्म्यति ||  ४०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति