उद्योग पर्व  अध्याय १३५

कुन्त्यु उवाच

अर्जुनं केशव व्रूय़ास्त्वय़ि जाते स्म सूतके |  १   क
उपोपविष्टा नारीभिराश्रमे परिवारिता ||  १   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति