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उद्योग पर्व
अध्याय १३५
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वैशम्पाय़न उवाच
ते पिवन्त इवाकाशं दारुकेण प्रचोदिताः |  २९   क
हय़ा जग्मुर्महावेगा मनोमारुतरंहसः ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति