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द्रोण पर्व
अध्याय १३५
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सञ्जय़ उवाच
योत्स्येऽहं शत्रुभिः सार्धं जेष्यामि च वरान्वरान् |  १०   क
पाञ्चालैः सह योत्स्यामि सोमकैः केकय़ैस्तथा |  १०   ख
पाण्डवेय़ैश्च सङ्ग्रामे त्वत्प्रिय़ार्थमरिन्दम ||  १०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति