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द्रोण पर्व
अध्याय १३५
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सञ्जय़ उवाच
प्रिय़ा हि पाण्डवा नित्यं मम चापि पितुश्च मे |  २   क
तथैवावां प्रिय़ौ तेषां न तु युद्धे कुरूद्वह |  २   ख
शक्तितस्तात युध्यामस्त्यक्त्वा प्राणानभीतवत् ||  २   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति