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द्रोण पर्व
अध्याय १३५
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सञ्जय़ उवाच
पुत्रः पाञ्चालराजस्य धृष्टद्युम्नो महारथः |  २२   क
द्रौणिमित्यव्रवीद्वाक्यं दृष्ट्वा योधान्निपातितान् ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति