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द्रोण पर्व
अध्याय १३५
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सञ्जय़ उवाच
आचार्यपुत्र दुर्वुद्धे किमन्यैर्निहतैस्तव |  २३   क
समागच्छ मय़ा सार्धं यदि शूरोऽसि संय़ुगे |  २३   ख
अहं त्वां निहनिष्यामि तिष्ठेदानीं ममाग्रतः ||  २३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति