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द्रोण पर्व
अध्याय १३५
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सञ्जय़ उवाच
ते तु पङ्क्तीकृता द्रौणिं शरा विविशुराशुगाः |  २५   क
रुक्मपुङ्खाः प्रसन्नाग्राः सर्वकाय़ावदारणाः |  २५   ख
मध्वर्थिन इवोद्दामा भ्रमराः पुष्पितं द्रुमम् ||  २५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति