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द्रोण पर्व
अध्याय १३५
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सञ्जय़ उवाच
न जानीषे प्रतिज्ञां मे विप्रोत्पत्तिं तथैव च |  ३०   क
द्रोणं हत्वा किल मय़ा हन्तव्यस्त्वं सुदुर्मते |  ३०   ख
ततस्त्वाहं न हन्म्यद्य द्रोणे जीवति संय़ुगे ||  ३०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति