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द्रोण पर्व
अध्याय १३५
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सञ्जय़ उवाच
इमां तु रजनीं प्राप्तामप्रभातां सुदुर्मते |  ३१   क
निहत्य पितरं तेऽद्य ततस्त्वामपि संय़ुगे |  ३१   ख
नेष्यामि मृत्युलोकाय़ेत्येवं मे मनसि स्थितम् ||  ३१   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति