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द्रोण पर्व
अध्याय १३५
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सञ्जय़ उवाच
यस्ते पार्थेषु विद्वेषो या भक्तिः कौरवेषु च |  ३२   क
तां दर्शय़ स्थिरो भूत्वा न मे जीवन्विमोक्ष्यसे ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति