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द्रोण पर्व
अध्याय १३५
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सञ्जय़ उवाच
यो हि व्राह्मण्यमुत्सृज्य क्षत्रधर्मरतो द्विजः |  ३३   क
स वध्यः सर्वलोकस्य यथा त्वं पुरुषाधम ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति