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द्रोण पर्व
अध्याय १३५
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सञ्जय़ उवाच
स छाद्यमानः समरे द्रौणिना राजसत्तम |  ३६   क
सर्वपाञ्चालसेनाभिः संवृतो रथसत्तमः ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति