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द्रोण पर्व
अध्याय १३५
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सञ्जय़ उवाच
तौ प्रय़ुद्धौ रणे दृष्ट्वा वने वन्यौ गजाविव |  ४३   क
उभय़ोः सेनय़ोर्हर्षस्तुमुलः समपद्यत ||  ४३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति