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द्रोण पर्व
अध्याय १३५
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सञ्जय़ उवाच
ततो द्रौणिर्महाराज पार्षतस्य महात्मनः |  ४६   क
ध्वजं धनुस्तथा छत्रमुभौ च पार्ष्णिसारथी |  ४६   ख
सूतमश्वांश्च चतुरो निहत्याभ्यद्रवद्रणे ||  ४६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति