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द्रोण पर्व
अध्याय १३५
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सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालांश्चैव तान्सर्वान्वाणैः संनतपर्वभिः |  ४७   क
व्यद्रावय़दमेय़ात्मा शतशोऽथ सहस्रशः ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति