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द्रोण पर्व
अध्याय १०८
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सञ्जय़ उवाच
तथा कृच्छ्रगतं दृष्ट्वा कर्णं दुर्योधनो नृपः |  ३४   क
वेपमान इव क्रोधाद्व्यादिदेशाथ दुर्जय़म् ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति