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द्रोण पर्व
अध्याय १३५
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सञ्जय़ उवाच
स निहत्य वहूञ्शूरानश्वत्थामा व्यरोचत |  ५३   क
युगान्ते सर्वभूतानि भस्म कृत्वेव पावकः ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति