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द्रोण पर्व
अध्याय १३५
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सञ्जय़ उवाच
सम्पूज्यमानो युधि कौरवेय़ै; र्विजित्य सङ्ख्येऽरिगणान्सहस्रशः |  ५४   क
व्यरोचत द्रोणसुतः प्रतापवा; न्यथा सुरेन्द्रोऽरिगणान्निहत्य ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति