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द्रोण पर्व
अध्याय १३५
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सञ्जय़ उवाच
आत्मार्थं युध्यमानास्ते समर्थाः पाण्डुनन्दनाः |  ७   क
किमर्थं तव सैन्यानि न हनिष्यन्ति भारत ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति