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विराट पर्व
अध्याय ५४
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वैशम्पाय़न उवाच
तमभिद्रुत्य कौन्तेय़ः क्रोधसंरक्तलोचनः |  २०   क
कामय़न्द्वैरथे युद्धमिदं वचनमव्रवीत् ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति