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शल्य पर्व
अध्याय १८
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सञ्जय़ उवाच
अद्य श्रुत्वा हतं पुत्रं धृतराष्ट्रो जनेश्वरः |  १५   क
निःसञ्ज्ञः पतितो भूमौ किल्विषं प्रतिपद्यताम् ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति