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शान्ति पर्व
अध्याय १३६
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भीष्म उवाच
न कश्चित्कस्यचिन्मित्रं न कश्चित्कस्यचित्सुहृत् |  १०४   क
अर्थैरर्था निवध्यन्ते गजैर्वनगजा इव ||  १०४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति