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आदि पर्व
अध्याय ५०
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आस्तीक उवाच
शक्रः साक्षाद्वज्रपाणिर्यथेह; त्राता लोकेऽस्मिंस्त्वं तथेह प्रजानाम् |  १२   क
मतस्त्वं नः पुरुषेन्द्रेह लोके; न च त्वदन्यो गृहपतिरस्ति यज्ञे ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति