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शान्ति पर्व
अध्याय १३६
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भीष्म उवाच
मित्रं च शत्रुतामेति कस्मिंश्चित्कालपर्यये |  १३५   क
शत्रुश्च मित्रतामेति स्वार्थो हि वलवत्तरः ||  १३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति