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द्रोण पर्व
अध्याय १३४
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सञ्जय़ उवाच
पुनरादाय़ तच्चापं निमेषार्धान्महावलः |  ४४   क
छादय़ामास वाणौघैः फल्गुनं कृतहस्तवत् ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति