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आदि पर्व
अध्याय १७
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सूत उवाच
तत्र दिव्यं धनुर्दृष्ट्वा नरस्य भगवानपि |  १९   क
चिन्तय़ामास वै चक्रं विष्णुर्दानवसूदनम् ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति