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शान्ति पर्व
अध्याय १३६
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भीष्म उवाच
अहमन्नं भवान्भोक्ता दुर्वलोऽहं भवान्वली |  १६०   क
नावय़ोर्विद्यते सन्धिर्निय़ुक्ते विषमे वले ||  १६०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति