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शान्ति पर्व
अध्याय १३६
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भीष्म उवाच
आत्मार्थे सन्ततिस्त्याज्या राज्यं रत्नं धनं तथा |  १७१   क
अपि सर्वस्वमुत्सृज्य रक्षेदात्मानमात्मना ||  १७१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति