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शान्ति पर्व
अध्याय १३६
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भीष्म उवाच
न त्वात्मनः सम्प्रदानं धनरत्नवदिष्यते |  १७३   क
आत्मा तु सर्वतो रक्ष्यो दारैरपि धनैरपि ||  १७३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति