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वन पर्व
अध्याय २२९
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वैशम्पाय़न उवाच
मत्तभ्रमरजुष्टानि वर्हिणाभिरुतानि च |  १३   क
अगच्छदानुपूर्व्येण पुण्यं द्वैतवनं सरः |  १३   ख
ऋद्ध्या परमय़ा युक्तो महेन्द्र इव वज्रभृत् ||  १३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति