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वन पर्व
अध्याय १५४
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वैशम्पाय़न उवाच
तथैव तस्मिन्व्रुवति भीमसेनो यदृच्छय़ा |  २८   क
प्रादृश्यत महावाहुः सवज्र इव वासवः ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति