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भीष्म पर्व
अध्याय १०३
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सञ्जय़ उवाच
अशक्यमपि कुर्याद्धि रणे पार्थः समुद्यतः |  ३८   क
त्रिदशान्वा समुद्युक्तान्सहितान्दैत्यदानवैः |  ३८   ख
निहन्यादर्जुनः सङ्ख्ये किमु भीष्मं नराधिप ||  ३८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति