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शल्य पर्व
अध्याय ४५
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वैशम्पाय़न उवाच
एताश्चान्याश्च वहवो मातरो भरतर्षभ |  २९   क
कार्त्तिकेय़ानुय़ाय़िन्यो नानारूपाः सहस्रशः ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति