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शान्ति पर्व
अध्याय १३६
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युधिष्ठिर उवाच
प्रज्ञातलक्षणे राजन्नमित्रे मित्रतां गते |  ८   क
कथं नु पुरुषः कुर्यात्किं वा कृत्वा सुखी भवेत् ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति