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वन पर्व
अध्याय १८९
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मार्कण्डेय़ उवाच
निवोध च शुभां वाणीं यां प्रवक्ष्यामि तेऽनघ |  १८   क
न व्राह्मणे परिभवः कर्तव्यस्ते कदाचन |  १८   ख
व्राह्मणो रुषितो हन्यादपि लोकान्प्रतिज्ञय़ा ||  १८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति