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वन पर्व
अध्याय २३५
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चित्रसेन उवाच
पापोऽय़ं नित्यसन्दुष्टो न विमोक्षणमर्हति |  ९   क
प्रलव्धा धर्मराजस्य कृष्णाय़ाश्च धनञ्जय़ ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति