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वन पर्व
अध्याय २८
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वैशम्पाय़न उवाच
यतीनामगृहाणां ते तथैव गृहमेधिनाम् |  १६   क
दीय़ते भोजनं राजन्नतीव गुणवत्प्रभो |  १६   ख
तच्च राजन्नपश्यन्त्याः का शान्तिर्हृदय़स्य मे ||  १६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति