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वन पर्व
अध्याय १३६
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भरद्वाज उवाच
एवं लव्ध्वा वरान्वाला दर्पपूर्णास्तरस्विनः |  १४   क
क्षिप्रमेव विनश्यन्ति यथा न स्यात्तथा भवान् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति