आश्रमवासिक पर्व  अध्याय ४५

नारद उवाच

चिरदृष्टोऽसि मे राजन्नागतोऽस्मि तपोवनात् |  ५   क
परिदृष्टानि तीर्थानि गङ्गा चैव मय़ा नृप ||  ५   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति