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वन पर्व
अध्याय १३६
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भरद्वाज उवाच
दर्पस्ते भविता तात वराँल्लव्ध्वा यथेप्सितान् |  २   क
स दर्पपूर्णः कृपणः क्षिप्रमेव विनश्यसि ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति