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शान्ति पर्व
अध्याय २८४
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पराशर उवाच
इषुप्रपातमात्रं हि स्पर्शय़ोगे रतिः स्मृता |  ३२   क
रसने दर्शने घ्राणे श्रवणे च विशां पते ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति