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आदि पर्व
अध्याय १३७
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वैशम्पाय़न उवाच
निर्वापय़न्तो ज्वलनं ते जना ददृशुस्ततः |  २   क
जातुषं तद्गृहं दग्धममात्यं च पुरोचनम् ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति