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आदि पर्व
अध्याय १३७
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वैशम्पाय़न उवाच
नूनं शान्तनवो भीष्मो न धर्ममनुवर्तते |  ५   क
द्रोणश्च विदुरश्चैव कृपश्चान्ये च कौरवाः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति