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शान्ति पर्व
अध्याय १९२
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व्राह्मण उवाच
नाभिसन्धिर्मय़ा जप्ये कृतपूर्वः कथञ्चन |  ५४   क
जप्यस्य राजशार्दूल कथं ज्ञास्याम्यहं फलम् ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति